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सोमवार, 13 सितंबर 2010

अच्छे लोग

अच्छे लोग
दिख सकते हैं कहीं भी
अगर आपके पास हो पारख़ी नज़र
और साफ़-सुथरा दिल

अच्छे लोग
होते हैं बेहद साफ़
झरने के पानी की तरह
फूल की खुशबू की तरह
पहाड़ों से आती हवा की तरह

अच्छे लोग
इतने अच्छे होते हैं
कि बच्चे भी उन्हें पहचान सकते हैं
बेहद आसानी से

अच्छे लोग
इतने सीधे होते हैं
कि बहरूपिये उनसे चिढ़ते हैं
कि वो कर नहीं पाते
उनके सीधेपन की नक़ल

अच्छे लोग
ज़रा ज़्यादा ही ईमानदार होते हैं
इसलिए आलोचनात्मक होते हैं आमतौर पर
और थोड़े डरपोक भी

अच्छे लोगों की
सबसे बड़ी गड़बड़ी
यही होती है
कि जहाँ उन्हें साबित होना चाहिए समझदार
वहाँ वे साबित होते हैं बेहद अनाड़ी

अच्छे लोगों की
सबसे बड़ी खूबी यही होती है
कि वे अच्छे होते हैं
और अच्छे बने रहना चाहते हैं
हर हाल में

अच्छे लोग
इतने अच्छे होते हैं
कि एक अदना सा कवि भी
लिख सकता है उन पर
एक सबसे अच्छी कविता

                                                मुकेश मानस

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

वह क्या सोचेगा इस संसार, इस देश के बारे मै

वह क्या सोचेगा इस संसार, इस देश के बारे मै
सूरज की गर्मी मै पसीना बहाने मै
वक्त गुजर जाता है दो रोटी कमाने मै
वह क्या सोचेगा इस संसार, इस देश के बारे मै
जो रोते हुवे बच्चे को चुप करा नहीं पाता
शाम होने के बाद भी घर पहुँच नहीं पाता
वह क्या सोचेगा इस संसार, इस देश के बारे मै

सोमवार, 9 अगस्त 2010

"मैं" और "तुम"

प्रेमी प्रेमिका के घर का दरवाजा खटखटाता है
प्रेमिका : बाहर कोन है
प्रेमी : मै हूँ
प्रेमिका : इस घर मै एक साथ "मैं" और "तुम" नहीं रह सकते है
प्रेमी वापस लोट जाता है
कुछ दिनों बाद वापस लोट के आता है फिर दरवाजा खटखटाता है
फिर प्रेमिका कहती है
प्रेमिका : बाहर कोन है
प्रेमी कहता है
प्रेमी : तू ही है !
प्रेमिका दरवाजा खोल देती है

बुधवार, 28 जुलाई 2010

भष्ट बेपरवाह और बिंदास

आप चाहे जो कहें। पर भष्ट होना आज की तारीख में श्रेष्ठ होने से कमतर नहीं है। श्रेष्ठ होने का पैमाना होता है मगर भष्ट होने का कोई पैमाना नहीं होता है। आप कैसे भी। कहीं भी। किधर भी। भष्ट हो सकते हैं। कहीं कोई रोक-टोक नहीं। समाज में जितनी जल्दी पहचान भष्ट और भष्टाचार को मिलती है, उतनी श्रेष्ठ को नहीं। श्रेष्ठ हट-बचकर, साफ-सफाई के साथ जिंदगी को जीते हैं। भष्ट बेपरवाह और बिंदास होकर जिंदगी का मज़ा लेते हैं। श्रेष्ठ जेल जाने से भय खाता है। भष्ट खुलकर जेल जाता है। श्रेष्ठ के पांव होते हैं। भष्ट के पांव नहीं होते।
अभी हाल ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल ने जो सूची जारी की है उसे जान-पढ़कर मैं बेहद प्रसन्न हूं। भष्टाचार में हम 72वें से 74वें स्थान पर आ गए हैं। हमारे भष्ट होने-कहलवाने में दो अंकों का सुधार हुआ है। यह सुधार जितना रचनात्मक है उतना ही विचारात्मक भी। इससे पता चलता है कि भष्टाचार हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इसकी उपयोगिता बढ़ने लगी है। लोग भष्ट होने के नए-नए तरीके सोचने-खोजने लगे हैं। हर कोई फिराक में है कि दांव लगे और गर्दन काटें। अब तक सरकारी महकमा ही भष्टाचार फैलाने का दोषी माना जाता था लेकिन अब निजी संस्थान भी उसी राह पर चलने लगे हैं। भष्टाचार भारत के कण-कण। रग-रग में अपनी पैठ जमा चुका है।
जिन्हें ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल की रपट के आधार पर भारत के भष्ट-चरित्र पर ऐतराज़ है उनसे मेरा कहना है कि हम भष्टाचार में अभी बहुत पीछे हैं। आप ज़रा आंकड़े उठाकर देखिए हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान तो 140वें रूस, 145वें, ईरान और लीबिया 134वें व 135वें पायदान पर हैं। भष्टाचार में चीन भी कहां पीछे है हमसे। क्या आपको नहीं लगता इन तमाम भष्ट देशों के बीच हम कितने कम-भष्ट-देश हैं!
हम भष्टाचार को निभाना जानते हैं। हम भष्ट होते या बनते वक्त इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि सामने वाला हमारा सहयोगी बन हमारा साथ निभाए। हमारे यहां अब तक जितने भी छोटे-बड़े घपले-घोटाले हुए हैं उनमें किसी एक की भूमिका कभी नहीं रही। कई-कई लोग इस भष्ट-मिशन में संग-साथ रहे। भष्टाचार का यह नियम है कि वो कभी एक व्यक्ति द्वारा संचालित नहीं होता। उसे जन-समर्थन हर कीमत पर हर जगह से चाहिए।
मुझे तो उन सिरफिरों की बातों को सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है जो भष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प यहां-वहां लेते फिरते हैं। हकीकत यह है कि ये आशावादी लोग आज तक अपनी सोच के भीतर छिपे भष्टाचार को बाहर नहीं ला पाए हैं, समाज का भष्टाचार क्या ख़ाक खत्म करेंगे! मेरे विचार से ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल को एक रपट लोगों की सोच के भीतर छिपे-बैठे भष्टाचार पर तैयार करनी चाहिए ताकि हम जान-समझ सकें कि हम दिमागी तौर पर किस कदर भष्ट हैं। अगर यहां सामाजिक भष्टाचार है तो दिमागी भष्टचार भी कुछ कम नहीं। अंततः भष्टाचार दिमाग की ही तो उपज है।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

प्रेम का भाव

यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने जिय से जानिये, मेरे जिय की बात

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब प्रेम का भाव हृदय में उत्पन्न होता है तो दोनों प्रेमी आपस में इस तरह मिले हुए लगते हैं जैसे कि वह एक तत्व हों। वह दोनों अपने मुख से कहे बगैर एक दूसरे के हृदय की बात जान लेते हैं।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकासय
राजा परजा जो रुचै, शीश देव ले जाये

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम की फसल किसी खेत में नहीं होती और न ही वह किसी हाट या बाजार में बिकता है। प्रेम तो वह भाव है कि अगर किसी व्यक्ति के प्रति मन में आ जाये तो भले ही वह सिर काटकर ले जाये। यह भाव राजा और प्रजा दोनों में समान रूप से विद्यमान होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल तो हर जगह प्रेम प्रेम शब्द का उच्चारण होता है। खासतौर से आजकल के बाजार युग में प्रेम को केवल युवक युवतियों के आपसी संपर्क तक ही सीमित हो गया है। इसमें केवल तत्कालिक शारीरिक आकर्षण में बंधना ही प्रेम का पर्याय बन गया है। सच बात तो यह है कि प्रेम तो किसी से भी किया जा सकता है। भारतीय अध्यात्म में प्रेम का तो व्यापक अर्थ है और उसमें केवल निरंकार परमात्मा के प्रति ही किया गया प्रेम सच्चा माना जाता है। संसार में विचरण कर रहे जीवन से प्रेम करना तो एक तरह से अपनी आवश्यकताओं से उपजा भाव है। हां, अगर उनसे भी अगर निष्काम प्रेम किया जाये तो उससे सच्चे प्रेम का पर्याय माना जाता है।
सच्चा प्रेम तो वही है जिसमेंे कोई प्रेमी दूसरे से किसी प्रकार की आकांक्षा न करे जहां आकांक्षा हो वहां तो वह प्रेम सच्चा नहीं रह जाता। प्रेम का भाव तो स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है और वह बाह्य रूप नहीं बल्कि किसी व्यक्ति के आंतरिक गुणों से ही जाग्रत होता है। अतः जो निच्छल मन, उच्च विचार, और त्यागी भाव के होते हैं उनके प्रति सभी लोगों में मन में प्रेम का भाव उत्पन्न होता है।
                                                                                                                 दीपक भारतदीप, ग्वालियर