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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

1हाथ में पकड़ा फूल
चुपचाप कह सकता है
कि मैं अमन के लिए हूँ
पर हाथ में पकड़ी तलवार
बोलकर भी नहीं कह सकती
कि मैं अमन के लिए हूँ...

2
आसमान पर भले ही
आसमान जितना लिखा हो
कि ज़िन्दगी दु:ख है
तो भी
धरती पर आदमी
अपने बराबर तो लिख ही सकता है
कि ज़िन्दगी सुख भी है...

3
मैं रंगों के संग खेलता
रंग मेरे संग खेलते
रंगों के संग खेलता-खेलता
मैं इक रंग हो गया
कुछ बनने, कुछ न बनने से
बेफिक्र, बेपरवाह...

4
बिखरने के लिए लोग ही लोग
पर एक होने के लिए
एक भी मुश्किल...
दरख़्त पंछियों को जन्म नहीं देते
पर पंछियों को घर देते हैं...

... फिर भी यहाँ जिंदा है हम, गैरों के दिए हुए नाम इंडिया से। "


नहीं स्वतंत्र अब तक हम, हमें स्वतंत्र होना है, कुछ झूठे देशभक्तों ने, किये जो पाप, धोना है।

"भारत मानव जाति के विकास का उद्गम स्थल तथा मानव बोली का जन्म स्थान है और साथ ही यह देश गाथाओं एवं प्रचलित परंपराओं का कर्मस्थल तथा इतिहास का जनक है। केवल भारत में ही मानव इतिहास की हमारी सबसे मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री खजाने के रूप में सहेजी गयी है। "

" आंसू टपक रहे है, भारत के हर बाग से,
... शहीदों की रूहे लिपट के रोती है, हर खासो आम से,
अपनों ने बुना था हमें, भारत के नाम से,
... फिर भी यहाँ जिंदा है हम, गैरों के दिए हुए नाम इंडिया से। "

हम बनायेंगे नया हिंदुस्तान
मेरा भारत महान
हमे गर्व है की हम हिन्दुस्तानी हैं

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ये आधुनिकता की अंधी दौड़, न जाने कहाँ ले जायेगी ?

ये आधुनिकता की अंधी दौड़, न जाने कहाँ ले जायेगी ?
सोचता हू, तो डर जाता हू,
ये संसकृति, सिद्धांत और आदर्शो की विरासत, अब कब तक टिक पायेगी ?
ये आधुनिकता की अंधी दौड़, न जाने कहाँ ले जायेगी ?

अब ग्रहस्थी के दोनों स्तंभ, सुख के संसाधन जुटाते है,
चार हाथों से अर्थ बटोर, वे फुले ना समाते है,
कोई शक नहीं जो ये पीढ़ी, जरुरत से कुछ जयादा जुटा लाएगी,
पर क्या, भावना, लगाव और शांति की अनमोल निधि, अक्षुण रख पायेगी ?
ये आधुनिकता की अंधी दौड़, न जाने कहाँ ले जायेगी ?

वो नारी जिसे करूणा, दया और प्रेम की मूर्ति कहा जाता था,
जिनके त्याग और मातृत्व की ताकत के आगे, नर खुद को झुका पाता था,
आधुनिकता के इस दौर में उसने खुद को किस हद तक निचे ला डाला है,
फिर भी दंभ देखो, कहती है खुद को किस खूबी से संभाला है,
ये झूठे दिखावे और बनावटी प्रतिस्प्रधा ही होड़ में,
क्या कुछ ना कर जाएँगी, और तनिक ना शर्मायेंगी,
पर जो प्रकृति है उनका और कर्तव्य भी, उसे करते खुद को पिछडा पाएँगी,
ये आधुनिकता की अंधी दौड़, न जाने कहा ले जायेगी ?
सोचता हू , तो कॉप जाता हू,
ये मातृत्व, त्याग और प्रेम की मिसाल, क्या अब खोजने से भी मिल पायेगी ?

बुधवार, 30 नवंबर 2011

शब्दो से जताना छोड़

मेरी चुप्पी को वो समझ ना पाया कभी
इसिलए हमने शब्दो से जताना छोड़  दिया  
                           -  अनूप पालीवाल

बुधवार, 2 नवंबर 2011

जिंदगी की उलझने

जिंदगी की उलझने शरारतो को कम कर देती है 
और लोग समझते है की हम बहुत बदल गए है !