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सोमवार, 14 जून 2010

उम्र भर ...

तुमसे सिर्फ .....

प्रेम

अस्तित्व

तुम प्रेम के मोती को समेटे
हुए सागर हो
और मै नमक की ढली

प्रेम की तलाश मै
सागर मै डूबा
और
अपना अस्तित्व खो बैठा
                          अनूप पालीवाल

रविवार, 13 जून 2010

सफलता

चुनोतिया जीवन को मजेदार बनाती है, और इसे पार करने पर जीवन अर्थ पूर्णः हो जाता है .....

जब कोई कहता है की '' यह नहीं हो सकता '' तो मुझे महसूस होता है की '' मै सफलता के करीब हूँ .....

जब तक तुम अपने पंखो को फेलाओगे नहीं, तब तक तुम्हे पता नहीं चलेगा की '' तुम कितनी ऊँची उडान भर सकते हो '' ....
                                                                                               
                                                                                             अनूप पालीवाल

तुम्हारे इंतजार मै ......

हाँ ... चाँद ही तो हो तुम
जिसकी रोशनी से मैने
रात के अँधेरे मै प्यार का सफ़र तय्किया
और इस सफ़र मै कई अमावस आई गई
हाँ .... पर शायद
यह अमावस बहुत लम्बी है
बहुत लम्बी है
फिर भी
खुद को जलाकर
जुगनू बनाकर
वन, वृक्ष, टहनियों पर
रहकर
उम्र भर
तकता रंहुंगा आसमान को
पूर्णिमा के इंतजार मै
तुम्हारे इंतजार मै ......

                              अनूप पालीवाल

नजरिया

जो भी रचा है , मैंने
मे उसी का हिस्सा हूँ
पूरी तरह मोजूद हूँ उसमे
मेरा बहरिकरण और अंतःकरण
हर तरह से उत्तरदाई है
मे अपनी तमाम कमियों और अतियो मे सामिल हूँ
मेरे अज्ञान या मेरी लापरवाही से छुट गई है
जो गूंजाइशे
उसे मे पूरा नहीं कर संकुंगा उम्र भर
मै अपनी रची दुनिया के लिए दोषी हूँ
इसमे सामिल नहीं है
दुनिया भर के झगड़े, घर की परेशानी
पड़ोस के किस्से, दोस्तों की जरुरत
जानगया हूँ
ईश्वर ने रचा है मुझे
मै मनुष्य हूँ
मै मनुष्य होने की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता
अन्तःतह मै
निसंकोच कहूँगा
मै अपना नजरिया
अपनी सोच बदलूँगा ........
                                      अनूप पालीवाल  

शुक्रवार, 4 जून 2010

समझौता

"तुम लोगों को देखते हो -- वे दुखी हैं क्योंकि उन्होंने हर मामले में समझौता किया है, और वे खुद को माफ नहीं कर सकते कि उन्होंने समझौता किया है। वे जानते हैं कि वे साहस कर सकते थे लेकिन वे कायर सिद्ध हुए। अपनी नजरों में ही वे गिर गए, उनका आत्म सम्मान खो गया। समझौते से ऐसा ही होता है।" ओशो

गुरुवार, 3 जून 2010

माँ - मुनव्वर राना

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है


घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

मैदान छोड़ देने से मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो यह ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई

‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती 

                                                         -  मुनव्वर राना