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सोमवार, 4 जून 2012

जब पैसा नहीं हो तब कैसे बनें धनवान ?

धन हो तब मनुष्य धनवान कहलाता है, कुछ लोग दिवाली इसी विचार से मनाते हैं। यह संसार की साधारण परिभाषा है, लेकिन अध्यात्म बताता है बिना धन के धनवान कैसे बनें? दौलत को ही धन न समझा जाए। लक्ष्मी के अनेक स्वरूप हैं।

लोग लक्ष्मी के संदर्भ में केवल संपत्ति पर टिक गए। स्वस्थ शरीर, पवित्र मन, प्रेमपूर्ण परिवार, ईमानदार आचरण व योग्य संतानें हों तो आदमी बिना रुपयों के भी अधिक दौलतमंद होगा। ऋषि-मुनियों और संतों की परंपरा में अनेक नाम ऐसे हैं, जिनके सिर पर छत, तन पर सामान्य वस्त्र और निर्धन से भी बीता व्यावहारिक रहन-सहन था, लेकिन बड़े-बड़े राजा उनके चरणों में नतमस्तक थे।

सदाचारी के पास लक्ष्मी अलग रूप में आती है। लोगों ने लक्ष्मी को अपने जीवन में लाने और जाने के कई तरीके ईजाद किए। आज उनमें से एक पर विचार करें। वह तरीका है दान। इससे पुण्य अर्जन का काम किया गया।

दान लक्ष्मीजी को भी प्रिय है, लेकिन वे चाहती हैं, दया-भाव से दान मत करो, प्रेम-भाव से करो। जब तक कोई कमजोर न हो, दया शुरू कैसे होगी? दया करने के लिए सामने वाला दीन होना जरूरी है। धनवानों की एक रुचि यह भी रहती है कि लोग दीन बने रहें, वरना उनका दान कैसे चलेगा? यहीं से अमीरी-गरीबी की खाई गहरी बनाई जाती है।

सब बराबर हों और यदि ऐसा न भी हो तो कम-से-कम दान प्रेम की उपस्थिति से अहंकार व शोषण से मुक्त रहेगा। लक्ष्मी का आचरण यही है कि मुझ पर दबाव मत बनाना, वरना मैं कब, कैसे विपरीत परिणाम दूंगी, आदमी समझ ही नहीं पाएगा। इनका जन्म समुद्र मंथन से हुआ था। यह इस बात का प्रतीक है कि मुझे पुरुषार्थ से प्राप्त करो और परमार्थ में खर्च करो।
 -------------------------------------------------------------------------------  पं. विजयशंकर मेहता

गुरुवार, 31 मई 2012

कुछ पाकर खो देने का डर.........

कुछ पाकर खो देने का डर,
कुछ न पा सकने का भय,
ज़िन्दगी के पटरी से उतर जाने की चिंता..
इन्हीं छोटे-छोटे डरों से घिरी रहती है ज़िन्दगी, 
लेकिन जिस वक्त हम ठान लेते हैं.. 
कुछ नया करना है, तभी जन्म लेता है साहस! 
और फिर कदम कभी नहीं रुकते। मंजिलों तक ले जाता है
सिर्फ साहस। 

कोई भी संकल्प हौसले के बिना नहीं पूरा होता। 
पत्थरों को आपस में रगड़ते हुए
इंसान चिनगारियों से डरा होता तो आग न पैदा होती।

बुद्ध ने घर छोड़ने का साहस न किया होता तो 
हम अज्ञान से घिरे रहते।
अंग्रेजों से टकराने की हिम्मत थी, तभी हमें आजादी मिली। 

ज़िन्दगी के हर लम्हे में, हर मोड़ पर
साहस जरूरी है। हिम्मत ऐसा नायाब गुण है,
जिसके जरिए हर राह आसान होती है, हर
सफर तय करना मुमकिन हो पाता है।

साहस की ओर सात कदम............

1. अपनी अंतरात्मा की सुनें दुनिया के कुछ बहुत साहसी लोग इस श्रेणी में इसलिए शामिल हो पाए, क्योंकि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज
सुनी और आसपास घटित बातों को अनदेखा नहीं किया। महात्मा गांधी से बड़ा उदाहरण इस मामले में और क्या हो सकता है। उन्होंने जब दक्षिण अफ्रीका में अन्याय देखा तो इसका प्रतिकार करने का फैसला किया। उन्होंने ये सब बगैर हिंसा के किया। उन्होंने अन्याय के खिलाफ कोई हथियार बेशक नहीं उठाया, लेकिन उसके सामने झुकने से भी मना कर दिया। वह चाहते तो अपने लोगों की दुर्दशा को अनदेखा करके आरामदायक ज़िन्दगी भी बिता सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, बल्कि अंतरात्मा की आवाज सुनी। हालांकि इस पथ पर चलकर उन्हें खुद काफी संताप झेलना पड़ा। जब आप अपनी अंतरात्मा की राह पर चलते हैं तो ये देखें कहीं अन्याय तो नहीं हो रहा। चाहे वो आपका कार्यस्थल हो या आपके शहर, गांव या देश में या फिर आपका व्यक्तिगत जीवन। किसी अन्याय के खिलाफ स्टैंड लेना वाकई साहसपूर्ण होता है और साहस को बढ़ाता भी है।


2. भय महसूस करें तो इसे दूर करें साहस का मतलब ये नहीं कि आप डर नहीं सकते। असली साहसी भय भी महसूस करता है, लेकिन जरूरत इस बात की होती है कि इसे कैसे दूर करें। ये आपकी ज़िन्दगी में किसी भी रूप में हो सकता है। यहां तक कि अगर बॉस से वेतन वृद्धि के बारे में भी बात करनी हो और आपको लगता है कि आप इसके हकदार हैं तो साहस करें। कोई भी बात जो आपको भयभीत कर सकती है, नर्वस कर सकती है, उसे जरूर दूर करने की कोशिश करें।

3. कभी हिम्मत न हारें जब आप वास्तव में सच्चे दिल से कुछ चाहते हैं और इसे पाना मुश्किल होता है तो इसे हासिल करने के लिए पूरे साहस और समर्पण से जुट जाएं। हो सकता है कि कई बार आपको लगे कि आप हार गए या लक्ष्य असंभव हो गया, लेकिन तब भी साहस बटोर कर फिरसे जुट जाएं। मान लीजिए कि आप अपनी नौकरी गंवा चुके हैं, काम नहीं मिल रहा तो इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। हो सकता है कि आपको लगे कि आपने जो कुछ हासिल किया, वो धीमे-धीमे बिखरने लगे तो आसान विकल्प यही है कि हार मान लीजिए और मान बैठिए कि ज़िन्दगी आपके साथ साजिश कर रही है, लेकिन ऐसा करके आप खुद की हार को आमंत्रित करेंगे, बल्कि इसके उलट हर सुबह खुद को नए उत्साह से तैयार कीजिए। लग जाइए जॉब की तलाश में, आप खुद देखेंगे कि समय बदलने लगेगा। अगर आप दिमागी अवस्था में उत्साह और लगन बनाए रखेंगे और कभी हार नहीं मानने वाली स्थिति में होंगे तो तयशुदा तरीके से लक्ष्य तक पहुंचेंगे।

4. अनजाने को ग्रहण करें हम अंधेरे से क्यों डरते हैं? शायद इसलिए, क्योंकि अंधेरे में कुछ दिखता नहीं, सबकुछ अपरिचित-सा लगता है। हमें अंधेरे से ज्यादा भय अनजाने का होता है। हम अनजानी बातों से डरते हैं। हम जिन नौकरियों को पसंद नहीं करते, वे भी करते रहते हैं क्योंकि वे सुरक्षित और स्थायित्व वाली लगती हैं, इसी के चलते हम अपने सपनों को पूरा करने से डरते हैं। हकीकत में हम अपनी ज़िन्दगी में बदलाव से पहले यथास्थितिवादी बने रहना चाहते हैं। हमें शायद ये नहीं मालूम कि अधिकतर महान आविष्कार इन्हीं अनजानी स्थितियों से और अपरिचित को ग्रहण करने के साहस से ही सामने आए हैं। अगर आप बदलाव को स्वीकार करते हैं, भले ये आपको शुरू में डराए, लेकिन आखिरकार ज्यादा संतुष्टि वाली और खुश ज़िन्दगी की ओर ले जाता है। हो सकता है कि आप नौकरी नहीं छोड़ सकते हों, लेकिन नई बातों के लिए कोशिश तो कर सकते हैं।

5. सच्च विश्वास अगर आप किसी काम के लिए पूरी तरह समर्पित नहीं हैं, यानी जो कर रहे हैं, उस पर सौ फीसदी विश्वास नहीं करते तो उस काम को करने का मतलब क्या है, ऐसे में आप सच्चे अथरें में कभी सच्च साहस नहीं जुटा पाएंगे। अगर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं तो आपका अधूरा साहस आपको नाकाम कर देगा। साहस को उस काम के लिए बचा के रखिए, जिसमें आपको वाकई भरोसा है, जो आपको सही लगता है। अगर एेसा है तो अपनी पूरी ऊर्जा और साहस के साथ उसमें लग जाइए, फिर देखिए कि वो होता कैसे नहीं है!

6. नहीं कहने वालों को अनदेखा करिए इसका कोई मतलब नहीं है कि आपने अपनी ज़िन्दगी में क्या चुना है, आप पढ़ना चाहते हैं या व्यवसाय करना चाहते हैं, राजनीति में जाना चाहते हैं या कुछ और। आपके चारों ओर ढेर सारे नकारात्मक लोग होंगे, जो आपको अपनी बातों से सहमत करने की कोशिश करेंगे कि आप अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएंगे। अगर आप वाकई वहां पहुंचना चाहते हैं, जहां तक
पहुंचने का आपने इरादा बनाया है तो आपको नकारात्मकता को रोकना होगा। हमेशा अच्छी सलाह लेने की कोशिश करें। याद रखें कि आप अपने भाग्य या नियति के नियंता खुद होते हैं, अगर आप दूसरों को खुद पर प्रभाव डालने का मौका देंगे तो आप कभी वह हासिल नहीं कर पाएंगे, जो आप वाकई करना चाहते हैं।

7. असफलता के लिए तैयार रहें विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था कि साहस के रास्ते में नाकामियां भी आती हैं, बस उत्साह को बनाए रखना चाहिए। उनकी नज़र में सफलता के रास्ते में एक नाकामी जरूरी है, इसके बाद आप दोगुने उत्साह से अपनी कमियों को झाड़ कर खड़े हो सकते हैं। साहस आपको महसूस कराता है कि नाकामी का मतलब केवल इतना भर है कि आप अपनी सफलता के एक कदम और करीब पहुंच गए हैं, इसलिए नाकामी से कभी मत घबराइए और भय को आपकी हर कोशिश में अड़ंगा डालने से रोकिए। अनुभव से सीखिए और हर बार नई रणनीति अपनाएं।

मंगलवार, 8 मई 2012

कोई भी मूल्य एवं संस्कृति

कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.- कौटिल्य

जिनमें स्थितिओं को बदलने का साहस नहीं होता उन्हें स्थितिओं को सहना पड़ता है.  .- कौटिल्य

रविवार, 8 अप्रैल 2012

!!!! भारत का स्वर्णिम अतीत !!!!!

!!!! भारत का स्वर्णिम अतीत !!!!!

एक फ्रांस के इतिहासकार फ्रंस्वापिराध (1711) में भारत आकर अपनी किताब में लिखा की भारत में 36 तरह के उद्योग चल रहे थे और भारत पिछले 3000 वर्सो से एक्सपोर्टिंग कण्ट्री रहा है। इसी तरह कुछ और दुनिया के इतिहासकार भारत को एक अदभुत व सोने -चांदी का महासागर वाला देश मानते रहे इन इतिहासकारों की संख्या लगभग 200 है जिनके नाम इस प्रकार है::
1.FRANCVAPIRAAD(FRANCE)
2.MARTIN(SCOTISH)
3.TRAVENI(FRANCE)
4.WILLIAM BAARD(ENGLAND)
5.THOMAS MUNRO(GOVERNER OF MADDRAS, EAST INDIA COMPONY)
6.KAMPWELL
7.DR. SCOTT
8.JAMES FRANKLIN
9.A. BAAKER
10.G.W. LITINUS
11.WILLIAM DIGBY (1700)

(प्रमाणित दस्तावेजों पर लिखने वाला इतिहासकार यूरोप का) ने लिखा है की उद्योग ,कृषि ,दुनिया में भारत की सर्वस्रेस्थ व भारत दुनिया का ऐसा देश जिसे सोने -चांदी -हीरे का महासागर कहा जा सकता है .
इन सभी इतिहासकारों ने भारत को TECHNOLOGY में INDUSTRY में कृषि में दुनिया का नंबर 1 देश माना है .
2 FEB.1835 को T.B. MCLAY ने HOUSE OF COMMON'S(इंग्लैंड की संसद )में 3.5GHANTE की अपनी स्पीच में भारत की एक तस्वीर रखी है जैसे -
एक्सपोर्ट ऑफ़ इंडिया इन 1835=33%
GDP में भारत दुनिया की GDP में =43%
TOTAL INCOME दुनिया की कुल इनकुम में =27%

ये सभी प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर है जो की दिखाता है भारत TECHNOLOGY,व्यापार, कृषि, उत्पादन में कितना ताकतवर देश था ....!!!!! पर हमारे देश के अधिकांश पड़े लिखे लोग भारत के इतिहास के बारे में ग़लतफ़हमी में रहते है क्यों की जो इतिहास अँगरेज़ हमें तोड़ मरोड़ के पड़ा गए, उसे हमारे लोग ब्रह्म वाकया समझ लिया, जब की अंग्रेजी इतिहास कारो ने इंग्लैंड और यूरोप जाकर बिलकुल विपरीत बोला !!

जय हिन्द, जय भारत !!

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...

तुम जब मुड़े थे,
मुड़ गया था समय...
अपनी धुरी से...
मेरे इंद्रधनुष छूट गए तुम्हारे पास...
और एक चमकीली हंसी भी...
मेरे चेहरे पर सूरज ने मल दी उदासी,
जो धूप के हर टुकड़े में पूरी नज़र आती है...
तुम ये कभी देख नहीं पाए शायद...
कि जो छूट गया वो तुम थे,
जो मेरे पास रहा, वो भी तुम ही थे...

पत्थर समय से टकराकर,
मज़बूत हो गए हैं हम,
और ज़रा-सा चालाक भी...
कंधे जो हल्के थे कभी,
अपने ही बोझ तले झुक गए हैं...
जो भी देखता है कहता है,
बड़े हो गए हैं हम...

जब हम बड़े होते हैं,
हमारे साथ बड़ी होती है उम्र...
और धुंधली होती है याद..
बीत चुके उम्र की...
हमारे साथ बड़ा होता है खालीपन....
छूट चुके रिश्तों का...
और बड़ा होता है खारापन,
आंसूओं का...
चुप्पियां बड़ी होती हैं,
और उनमें छिपा दर्द भी..
ये तमाम शहर बड़े होते हैं हमारे साथ...
हमारे-तुम्हारे शहर...
शहरों की दूरियां घटती हैं,
रिश्तों की नहीं घटती...

और उम्मीद भी तो बड़ी होती है....
कि किसी दिन तेज़ आंधी में,
जब लचक रहा होगा मन,
हम पकड़ सकेंगे उम्र का दूसरा सिरा...
उम्र न सही एक ख़ास दिन ही सही,
बड़ा दिन..

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...
कि इस दिन को सजाया जाए..

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....
दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...
कोई तो नाम रखो इस दिन का...

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया...

जनता को ही मूर्ख बनाना

पत्थर बिन दीवार बनाना, इन्सानों ने सीख लिया
पत्थर दिल इन्सान बनाना, भगवानों ने सीख लिया.

दूर हुए सब रिश्ते-नाते,दूर हुआ मिलना-जुलना
अपनों का किरदार निभाना बेगानों ने सीख लिया

प्रेम के इजहारों के दिन भी, त्यौहारों में बदले हैं
इनसे भी अब लाभ कमाना, बाज़ारों ने सीख लिया

कौन है हमको लूटने वाला काश कभी हम जान सकें
खादी में भी खुद को छुपाना मक्कारों ने सीख लिया

घड़ियाली आंसू बहते हैं, संसद के गलियारों में
ज्यूँ मछली से प्यार जताना, मछुआरों ने सीख लिया

एक नहीं लाखों मरते हैं, धरती के इक कंपन से
ढेरों कुनबे साथ जलाना, शमशानों ने सीख लिया

डोल गई दिल्ली की सत्ता, ऐसा मतिभ्रम खूब हुआ
जनता को ही मूर्ख बनाना, सरकारों ने सीख लिया.

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

हम शायद सफलता का मूलमंत्र भूल चुके है.

कहते है कि मानव जीवन अमूल्य है, इसे प्राप्त करना सहज नहीं है लेकिन क्या हमने सोचा कि आज की इस आपाधापी में हमने इंसान बन कर क्या पाया है. आइये जरा इसका हिसाब करके देखते है :

आज हमारे पास बड़ी बड़ी इमारते तो है लेकिन सहनशक्ति थोड़ी सी है.
चौड़े रास्ते तो है लेकिन मानसिकता संकीर्ण है
हम खर्चते बहुत है लेकिन पाते कम है,
खरीदते ज्यादा है लेकिन उपयोग कम करते है.

हमारे पास बड़े मकान लेकिन छोटे परिवार है,
ज्यादा सुविधाए लेकिन कम समय है,
ज्यादा डिग्रियां है लेकिन कम समझ है,
ज्ञान अधिक है लेकिन परखने की शक्ति कम है,
दवाइयाँ बहुत है लेकिन तंदुरुस्ती कम है,

हमने अपने हक तो बड़ा दिए है लेकिन मूल्य खो दिए है.
हम बोलते बहुत है, नफरत ज्यादा करते है और सोचते कम है.
हमने जीने के तरीके खोज लिए लेकिन हम मानवता को भूल गए.
हमने जिंदगी में कई साल जोड़ दिए लेकिन हम किसी भी साल को जिंदगी से नहीं जोड़ पाए.
हमने धरती के बहार अंतरिक्ष पर तो विजय प्राप्त कर ली लेकिन खुद अपने अंतर्मन को नहीं जीत पाए
हमने हवा को साफ़ कर दिया लेकिन आत्मा को प्रदूषित कर दिया
हमने परमाणु को भी तोड़ दिया लेकिन अपनी सोच को नहीं छोड़ पाए
आज तनख्वाह ज्यादा हो गई है लेकिन सदाचार कम हो गया है
हम ज्यादा मात्रा में और कम गुणवत्ता में विश्वास करने वाले हो गए है.
लोग बलिष्ठ शरीर और कमजोर चरित्र वाले हो गए है
जिन्हें फायदे में ज्यादा और संबंधो में कम विश्वास है.

ये वो समय है जहाँ विश्व शांति की बात होती है
लेकिन गृह्कलेश ही खत्म नहीं होते, अवकाश ज्यादा और प्रसनत्ता कम रहती है,
ये दोहरी तनख्वाह और ज्यादा तलाक होते है, विशिष्ट महलनुमा मकान है, लेकिन टूटे हुए घर है.

आज के मानव के पास दिखाने को गर्व बहुत है
लेकिन वो अंदर से काफी हद तक खाली है.
ये दुर्गति शायद इसलिए है क्योंकि हम शायद सफलता का मूलमंत्र भूल चुके है.

लेकिन दिल खाली है

तब दोस्तों से घंटो बाते होती थी,
अब मोबाइल SMS से हाय हैलो होती है
तब क्रिकेट का बैट हाथ में होता था और सड़क पर क्रिकेट खेलने लग जाया करते थे,
अब लेपटोप और मोबाइल साथ में होता है और सड़क पर ही टिपियाने लग जाते है
तब शांत खड़े होकर चिड़िया और कोयल की आवाज़ सुना करते थे,
अब कंप्यूटर पर mpeg फाइल सुनते है
तब रात में छत पर लेट कर चमकते तारे देखा करते है,
अब काम के टेंशन में रात में तारे नज़र आते है
तब शाम को दोस्तों के साथ बैठ कर गपशप करते है,
अब चैट रूम में बनावटी लोगो से बाते करते है
तब ज्ञान प्राप्ति के लिए पढाई करते थे,
अब नौकरी बचाने के लिए पढ़ना पड़ता है
तब जेब खाली पर दिल उमंगो से भरा होता था,
अब जेब ATM, Credit/Debit card से भरी है लेकिन दिल खाली है
तब सड़क पर खड़े हो कर भी चिल्ला लेते थे,
अब घर में ही जोर से नहीं बोल पाते
तब लोग हमें ज्ञान का पाठ पढाते थे,
अब हम सबको ज्ञान देते फिरते है
--------------- संभार  Bhavesh (भावेश )

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

वजूद खो देंगे...

जिस दिन दुनिया सी चालाकी सीख जाएँगे
उस दिन हम अपना वजूद खो देंगे...

शीशा हूँ हश्र क्या होगा

मेरे वजूद का रिश्ता ही आसमान से है
न जाने क्यूँ उन्हें शिकवा मेरी उड़ान से है

मुझे ये ग़म नहीं शीशा हूँ हश्र क्या होगा
मेरी तो जंग ही किसी चट्टान से है

मंगलवार, 13 मार्च 2012

मन की चंचलता रोकना ही योग है



चित्तवृतियों का निरोध करना यानी चित्त की चंचलता को रोके रखना ही योग है।
योग के आठ अंग हैं -यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
अगर किसी शख्स को ज्ञान मिल जाए तो वह अपना मन नियंत्रित कर सकता है।
शोक, मोह, ईर्ष्या, द्वेष से परे रहने वाला शख्स ही असली योगी कहलाता है। ऐसा शख्स ही अपने मन को स्थिर कर पाने में सफल हो सकता है।
तप, स्वाध्याय और ईश्वर की शरण लेना ही वास्तविक क्रिया योग कहलाता है।

समाधि हासिल करने के लिए मानसिक क्लेशों को दूर करना जरूरी है।
योग को अपनाने से अशुद्धि का नाश होता है और उससे ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है।
साक्षी भाव से जीवन जीना ही योग का असली लक्ष्य है।
सत्य को मन, वचन और कर्म से अपनाने पर वास्तविक धर्म की प्राप्ति होती है।
दूसरों की वस्तु चोरी न करने के स्वभाव से सभी रत्नों की प्राप्ति होती है।

संयम रखने से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
बर्फ और पानी एक ही चीज हैं, बस उनमें अवस्थाओं का अंतर हैं। ठीक इसी तरह प्रकृति भी तमाम रूपों में पसरी हुई है।
कष्ट, निराशा, नर्वसनेस और सांस का तेज चलना इस बात के संकेत हैं कि आपका मन शांत नहीं है।
-योग अच्छे-बुरे और जन्म-मृत्यु़ के पार जाने की कला है।
-मौत पर जीवन खत्म नहीं होता, बल्कि तब संभावना का एक और दरवाजा खुलता है।

-चेतन और अचेतन एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। चेतन अचेतन हो सकता है और अचेतन चेतन होता रहता है।
-जो अणु में है, वह विराट में भी है। जो बूंद में है, वही विराट सागर में भी है।
-देना ही पाना है। जब बूंद सागर में मिलती है तो वह खुद सागर हो जाती है।
-मनुष्य का व्यक्तित्व सात चक्रों में बंटा हुआ है। इन चक्रों में अनंत ऊर्जा सोई हुई है। हर चक्र खोला जा सकता है।
-ध्यान करने से चक्र सक्रिय हो जाते हैं।
-खुद के प्रति होश से भरना साधना है और आखिरकार होश न रह जाए, खुद खो जाए, यह सिद्धि है।
-जैसे ही मैं खो जाता है, सब मिल जाता है।

किस्मत की चड्डी

कुछ लोग चांदी के चम्मच में किस्मत की चड्डी पहन कर पैदा होते है .....जो काबिलियत की नाड़ी से बंधी रहती है

शनिवार, 10 मार्च 2012

अगर आप आशीर्वाद को मानते हो

अगर आप आशीर्वाद को मानते हो
तो आप को श्राप, हालाकला को भी मनना होगा .... 
इस लिए अपने कर्म को सोच समझ कर ही करे

रण का तुम आह्वान करो

पतन नहीं
उत्थान करो
रण का तुम
आह्वान करो
लक्ष्य भले ही
दुष्कर हो
अर्जुन सा
शर-संधान करो
भय का जो
अंधियारा हो
विफल प्रयास जो
सारा हो
एक ध्येय पर
अड़ जाओ
देह की माना
सीमा है
अन्तर की  सीमा
मत बांधो
 
श्राप को भी
वरदान करो 
- Sonal Rastogi....

सफलता का पहला सूत्र आत्म विश्वास ही है। - पं. विजयशंकर मेहता


अक्सर हम दुनिया जीतने निकल पड़ते हैं लेकिन खुद पर ही भरोसा नहीं होता। खुद पर भरोसे का मतलब है आत्म विश्वास से। जब भी कोई मुश्किल काम करने जाते हैं तो एक बार सभी के हाथ कांप ही जाते है।

सफलता का पहला सूत्र आत्म विश्वास ही है। अगर हम खुद पर ही भरोसा नहीं कर सकते, खुद की योग्यता का अनुमान ही नहीं लगा सकते हैं तो फिर किसी पर भी किया गया विश्वास हमारे काम नहीं आ सकता।

रामायण के एक प्रसंग में चलते हैं। वानरों के सामने समुद्र लांघने का बड़ा लक्ष्य था। समुद्र पास बसी लंका से सीता की खोज खबर लाना थी। जामवंत ने कहा कौन है जो समुद्र पार जा सकता है। सबसे पहले आगे आए अंगद। बाली के पुत्र अंगद में अपार बल था लेकिन उन्होंने कहा कि मैं समुद्र लांघ तो सकता हंू लेकिन लौटकर आ सकूंगा या नहीं इस पर संदेह है। जामवंत ने उसे रोक दिया। क्योंकि उसमें आत्म विश्वास की कमी थी।

जामवंत की नजर हनुमान पर पड़ी। जो शांत चित्त से समुद्र को देख रहे थे जैसे ध्यान में डूबे हों। जामवंत ने समझ लिया कि हनुमान ही हैं जो पार जा सकते हैं। क्योंकि इतनी विषम परिस्थिति में भी वो शांत चित्त हैं। जामवंत ने हनुमान को उनका बल याद दिलाया और बचपन की घटनाएं सुनाई।

हनुमान विश्वास से भर गए। एक ही छलांग में समुद्र लांघने को तैयार हो गए। उनका यह विश्वास काम आया। समुद्र लांघा, सीता का पता लगाया, और फिर इस पार लौट आए।

अंगद भी ये काम कर सकते थे लेकिन उनके भीतर खुद की योग्यता पर विश्वास नहीं था। इस आत्म विश्वास की कमी से वो एक बड़ा मौका चूक गए।


पं. विजयशंकर मेहता

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

टॉप 6 सीईओ से सीखें मैनेजमेंट मंत्र

हर पद अपने साथ नई जिम्मेदारियां लेकर आता है। जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, आपको रुटीन कामों के अलावा कंपनी की नीति से तालमेल बिठाते हुए कई प्रबंधकीय कार्य भी करने पड़ते हैं। कई महत्वपूर्ण फैसले लेने होते हैं। आज आप भले ही अपनी पहली या दूसरी नौकरी कर रहे हैं, पर भविष्य में हो सकता है कि आप अपना व्यवसाय शुरू करें या फिर कंपनी में महत्वपूर्ण पदों पर काम करने का मौका मिले। उच्चपदों पर कौन से प्रबंधकीय और नेतृत्व गुण आपको सफलता दिला सकते हैं, जानते हैं देश के टॉप सीईओ से उनके मैनेजमेंट मंत्र के जरिये

कर्मियों को विकसित होने का मौका दें
राजीव चोपड़ा, एमडी एंड सीईओ, फिलिप्स इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया लि.
किसी व्यक्ति को संस्थान में हायर करते समय मैं उम्मीदवार की आगे बढ़ने और लक्ष्यों को हासिल करने की इच्छा शक्ति, सीखने की क्षमता, उसकी सोच के विस्तार को तरजीह देता हूं। भले ही किसी व्यक्ति का पूर्व अनुभव कितना भी हो, पर मैं यह ध्यान रखता हूं कि वह उम्मीदवार मेरे संस्थान में कितना उपयोगी रहेगा। इस प्रक्रिया में अहम् बात उन उम्मीदवारों को बढ़ावा देने के लिए सही वातावरण तैयार करने से जुड़ी है। उम्मीदवार रखते समय जरूरी नहीं कि वे उसी क्षेत्र से जुड़े हों। अच्छा परफॉर्म करने वाले हमेशा ही अच्छा परफॉर्म करेंगे, यदि वे आधारभूत स्किल्स रखते हैं, बशर्ते आपके संस्थान में बढ़ोतरी और विकास के वे तमाम अवसर मौजूद हों। बीएमआईएस को विकसित करें
राणा कपूर, एमडी एंड सीईओ, यस बैंक
बिजनेस मैनेजमेंट, इनोवेशन और उचित स्ट्रेटजी यह तीन बातें ऐसी हैं, जिसने यस बैंक के आगे बढ़ने में भूमिका निभाई है। परंपरागत रूप से लोग केवल इसे एचआर कार्यो के तौर पर देखते हैं, पर यह कार्य स्वयं में बड़ा विस्तृत है। हमारे यहां बड़े स्तर पर 20 अलग-अलग पृष्ठभूमि के ऑफिसर हैं, जो बैंक के बिजनेस, रुटीन कार्यों और ऑपरेशनल लीडरशिप में बराबर भागेदारी निभाते हैं, जिनका प्रमुख कार्य विभिन्न विभागों के कार्यो को नियमितता प्रदान करना होता है। कहने का आशय है कि सिर्फ कंपनी के विजन को आउटलाइन करना काफी नहीं है, उसे कार्यात्मक रूप भी देना होता है।  

कम्युनिकेशन है महत्वपूर्ण कुंजी
विक्रम बख्शी, मैनेजिंग डायरेक्टर, मैकडॉनल्ड, इंडिया (उत्तर व पूर्व)
यहां मंत्र है कि हम अपने नए व रचनात्मक विचारों पर निरंतर कार्य करते रहें। जब कोई नया बिजनेस विचार आता है तो हम यह भूल जाते हैं कि इसे उपभोक्ता द्वारा स्वीकार करने और समझने में समय लगेगा। हर बिजनेस को कुछ समय और पैसे की जरूरत होती है। उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है। आपकी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और आपका ब्रांड अलग उभर कर आना चाहिए। लंबे समय तक बिजनेस को बनाए रखने में और उपभोक्ताओं को खुद से जोड़ने में ब्रांड की बड़ी भूमिका होती है। जुझारू बनें और निरंतर कार्य करते रहें। सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं होता।

 अपनी सोच को आवाज देने में सक्षम लोगों को चुनें
दीप कालरा, फाउंडर एंड सीईओ, मेकमाईट्रिप
अक्सर नियोक्ता अपने यहां ऐसे कर्मियों को रखने की गलती करते हैं, जिनमें वे अपनी छवि देख रहे होते हैं। ऐसा व्यक्ति हो, जो प्रोफाइल में आपकी सोच के मुताबिक हो और बातचीत से भी आप संतुष्ट हों, जरूरी नहीं कि वह नौकरी में आपके लिए परफेक्ट साबित हो। ऐसा व्यक्ति, जो आपकी राय को चुनौती दे सकता हो, अपनी बात को पेश करना जानता हो और मात्र जॉब पाने के लिए आपकी हर बात को स्वीकार करने के लिए तैयार न हो, वह उम्मीदवार आपके लिए अधिक उपयुक्त होगा। तेजी से बदलते परिवेश में, जहां तरक्की के लिए निरंतर इनोवेशन की जरूरत हो, वहां विभिन्नता होना भी जरूरी है।  

जो अच्छा है, उपयोगी है, उसे बचाएं
किशोर बियानी, फाउंडर एंड ग्रुप सीइओ, फ्यूचर ग्रुप
यह प्रकृति का नियम है और फ्यूचर ग्रुप में भी इसी बात को अपनाया जाता है कि जो भी अच्छा और उपयोगी हो, उसे सहेज कर रखें। जीवन प्रक्रिया में संरचना, संरक्षण और संहार यह तीन चीजें होती हैं। मेरी राय में यह बातें कॉरपोरेट कार्य संस्कृति पर भी लागू होती है। उपयोगी चीजों को हम सिर्फ संभाल कर नहीं रखते, बल्कि उसका पुनर्निमाण भी करते हैं। महत्वहीन चीजों को नष्ट कर दिया जाता है। मैं कार्यस्थल पर भी इस बात से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं। इसे निरंतर बदलाव और आगे विकास करने की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, आपको स्वयं को बदलाव के लिए तैयार रखना चाहिए। यही वह बिंदु है, जहां आप किसी भी चुनौती या मोड़ के लिए खुद को तैयार रख सकते हैं।

प्रोडक्टिव कार्य माहौल होना जरूरी
सचिन बंसल, सीईओ एंड को-फाउंडर, फ्लिपकार्ट
स्वस्थ और उत्पादक कार्य माहौल तैयार करने के लिए सुलभता और पारदर्शिता का होना जरूरी है। उदाहरण के लिए फ्लिपकार्ट में हमारे यहां कोई केबिन नहीं है। मेरे सहसंस्थापक बिन्नी बंसल समेत प्रत्येक व्यक्ति खुली स्पेस में बैठता है। कहीं भी, छोटा-सा भी विभाजन नहीं है। मीटिंग रूम का इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब हम मीटिंग कर रहे हों। यहां तक कि हमारे यहां ब्रेन स्टॉर्मिग सत्र भी ओपन फ्लोर में किए जाते हैं। यह सभी एक ऐसे संगठन का परिवेश बनाने में मदद करते हैं,जो खुला है और प्रवाहमान है।

क्योंकि हमारा मन भी दलदल में फँसे हाथी जैसा ही है

संतोष अर्थात सभी सुखों का दाता। संतोष का गुण ही जीवन में सुख-शांति लाने की उत्तम औषधि है.
कहा भी गया है कि जिस मनुष्य के पास संतोषरूपी गुण है, उसे पानी की बूँद भी समुद्र के समान प्रतीत होती है और जिसके पास यह गुण नहीं उसे समुद्र भी बूँद के समान प्रतीत होता है।

चींटी चावल ले चली/ बीच में मिल गई दाल।
कहत कबीरा दो ना मिले/ इक ले दूजी डाल॥


अर्थात- एक चींटी अपने मुँह में चावल लेकर जा रही थी, चलते-चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई।
मन में उसे भी लेने की इच्छा पैदा हुई, लेकिन चावल मुँह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी? दाल लेने को जाती तो चावल नहीं मिलता। चींटी का दोनों को लेना का प्रयत्न था। 'चींटी' का यह दृष्टांत हमारे जीवन का एक उत्तम उदाहरण है। हमारी स्थिति भी उसी चींटी जैसी है। हम भी संसार के विषय-भोगों में फँसकर अतृप्त ही रहते हैं, एक चीज मिलती हैं तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती हैं तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह परंपरा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।

यह हमारे मन का असंतोष ही तो है, हम को लोहा मिलता है, किन्तु हम सोने के पीछे भागने लगते हैं। पारस की खोज करते हैं, ताकि लोहे को सोना बना सकें। और असंतोष रूपी लोभ से ग्रसित होकर पारस रूपी संतोष को भूल जाते हैं, जिसके लिए हमें कहीं जाना नहीं पड़ता बल्कि वह तो हमारे पास ही रहता है। बस आवश्यकता है तो केवलमात्र उसे पहचानने की।

प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है, उसी में संतोष करना चाहिए, क्योंकि जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ ही है।

यह समझना चाहिए कि हमारे कल्याण के लिए प्रभु ने जैसी स्थिति में हमको रखा है, वही हमारे लिए सर्वोत्तम है, उसी में हमारी भलाई है।
हाँ, हमें यह चाहिए कि हम प्राप्त परिस्थिति और साधन का समुचित उपयोग कर अपने जीवन को सफल बनाएँ। मन के अनुसार न किसी को कभी कोई वस्तु मिली है और न ही मिलने वाली है। क्योंकि हमारा मन भी दलदल में फँसे हाथी जैसा ही है, जो बाहर निकलने के प्रयास में और अधिक धँसता चला जाता है। ऐसे ही यह करूँ, वह करूँ, इतना कर लूँ, इतना पा लूँ, करते-करते मनुष्य संसार में और फँसता चला जाता है।
इसलिए हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि-
गोधन, गजधन, वाजिधन, और रतन धन खान।
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान॥

मनुष्यता को छोड़ पशुता की तरफ जा रहा है ...

मनुष्य आधुनिकता के साथ अपने आप को धर्म निरपेक्ष तो बना रहा है मगर वह मनुष्यता को छोड़ पशुता की तरफ जा रहा है ...
भोतिकता में इस तरह लिप्त हो गया है की घर, परिवार, और समाज से दूर हो रहा है ... और यूनान के महँ दार्शनिक "अरस्तु " ने कहा भी है की जो समाज में नहीं रहता वह या तो पशु है या कोई इश्वर  ....

बिलकुल इसी तरह में कहता हु की जिसका कोई धर्म नहीं वह या तो पशु है या कोई एलियन ... बिना धर्म के मनुष्य तत्व पहचान नहीं है
इस लिए कोई भी व्यक्ति अपने धर्म को किसी और धर्म में परिवर्तित न करे .... उसी धर्म के सिधान्तो पर चल कर नेक कार्य करे ... खुद के लिए भी और ओरो के लिए भी ......

जहाँ शर्म से मस्तक झुक जाता है

आज भारत माँ को "लूटा" जा रहा है ,माँ की "इज्ज़त" खतरे में है . हमारी आज़ादी को किसी की बुरी नज़र लग गई लगता है . देश "मायावी" दानवों के चंगुल में "छटपटा" रहा है .प्रतिदिन अनेकों जाने जा रही है मुफ्त में...!!! कोई .."अनशन".. के नाम पर कोई .."आन्दोलन".. के नाम पर कोई .."दुर्घटना".. के नाम पर तो कोई .."अपराधियों".. .."आतंकवादियों"..  के हाथो मर रहा है कही .."मजबूरी".. मार रही है तो कही .."ब्यवस्था".. ............. रूप चाहे कोई भी हो पर......... ""मौत का नंगा नाच""... भारत भूमि पर खेला जा रहा है "हिन्दू" इतना मजबूर हो गया की वह भी ..."मरता क्या ना करता"... की स्थिति में "आतंकवाद" के सहारे अपना .."अस्तित्व".. बचाने की कोशिश में लगा है ..... आज कहने को भारत "आज़ाद" है पर ना तो यहाँ हमारी .."जान".. सुरक्षित है ना .."माल".. और ना ही .."इज्ज़त".. हर बार .."बहुसंख्यक".. समाज को ही ...""बलि का बकरा""... बनाया जाता है............ बड़े .."शर्म".. की बात है की एसे "विकट" समय में भी हमारे ....."""हिन्दू भाई सुबह सात बजे से ही"""....." नाच गाने"..... और .."चुटकुलों".. में "आनंद की प्राप्ति" करने लगते है. ............. अरे ..."गद्दारों"... तुम्हारी ...."माँ की इज्ज़त".... खतरे में है .."खज़ाना".. मायावी खाली किये जा रहे है ..... एसे में भी तुम .."मज़े".. में हो तो तुमसे बड़ा ..."हरामी"... और कहीं ढूंढना नहीं पड़ेगा बस फेसबुक खोल लो मिल जायेंगे ...."कपूतों".... के झुण्ड के झुण्ड............. फिर बताओ इस .."दुर्दशा".. का ..... """असली जिम्मेदार""".....  कौन है...?????????????

इन्हें होश में लाइए नहीं तो ... अंग्रेजो और मुगलों से बत्तर गुलामी को सहन कीजिये ..

जात पात का भेद मिटा दो कहते है नेता और  ........... "जातिप्रमाणपत्र" हाथ में थमा देते है

गरीब को गरीब होने का ..."सर्टिफिकेट"... बनबाना पड़ता है इस देश में ............वो भी रिश्वत देकर 

मंदिरों पर टेक्स , हज के लिए अनुदान एसा क्यों ?

छिप  छिप कर मिशनरियां धर्मपरिवर्तन का षड़यंत्र चला रही हैं ...?

निराश्रित बेसहाराओ को बेंक की लाइन में लगना पड़ता है निराश्रित पेंशन के लिए (बिना किसी सहारे के) 

दुसरे ने किया तो भ्रस्टाचार , अपनों ने किया तो आनाकानी

जनता खजाना भरती है अपने पैसे(टेक्स) से उसे कोई "हक" नहीं, खजाना खाली करने वालों (भ्रस्ट नेता) के कदमो में पूरा देश .

देश की कई बेटियों को इज्ज़त ढकने कपडे नसीब नहीं..... नेता देश की इज्ज़त बताकर खेलों के नाम पर करोडो गबन कर रहे

भारत के बेटे अस्पतालों की गैलरियों में पड़े इलाज को तरसते दम तोड़ रहे.... देश की अम्मा सरकारी खर्च पर विदेशों  में "गुप्त" बीमारियों का इलाज करा रही.  देश जानना चाहता है कोनसी बीमारी थी जिसका इलाज भारत में नहीं.??????

विदेशी पर्यटक के साथ बदतमीज़ी ....... सात दिन में "सजा"........... संसद पर "बमविष्फोट" सत्रह साल तक मेहमानी नवाजी 


लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे है कर्ज के बोझ  से ...... और सरकारें घोटालों में ब्यस्त हैं. 

प्रजातंत्र है और....... प्रजा (आम आदमी) की औकात ही नहीं "सपने" में भी चुनाव लड़ने की ..... क्या बेहतर होगा यदि उम्मीदवार का चयन आइ. ए. एस. / आइ.पी.एस. की तरह योग्यता के साथ ही राष्ट्र सेवा के आधार पर हो, और चुनाव खर्च व प्रबंधन खजाने से किया जाये...??? 

 "समानता का अधिकार" हर नागरिक का "मौलिक" अधिकार है,भारत के संविधान में फिर आरक्षण,अल्पसंख्यकवाद,विशेषाधिकार .... जाति धर्म  के अनुसार  अलग-अलग  कानून क्यों ?




जनसेवक "दमनकारी" हो गया है सत्ता के मद में... इन्हें होश में लाइए नहीं तो ... अंग्रेजो और मुगलों से बत्तर गुलामी को सहन कीजिये ... एसा लगता है अब देश हित में होने वाली क्रांति अब नहीं होगी .... क्यों की गाँधी ने दो बूंद अहेंसा की सारे देशवासियों को पिलाई है गाँधी ये नहीं जनता था की जिन लोगो के हाथ में देश की सत्ता सोप के जा रहा है वो अंग्रेजो से बत्तर है ... अंग्रेज तो भी अहेंसा से मन गए थे मगर ये क्रांति के बिना नहीं मानने वाले ......               जय हिंद ..... वन्दे मातरम .........

इन को हम गालियाँ तो बहुत देते हैं पर वोट उन्ही को देते है . इन को मुंह तोड़ जबाब देना होगा.

New stamp issue – India: Kavi Pradeep


Kavi Pradeep (1915–1998), born Ramchandra Baryanji Dwivedi, was a renowned poet and songwriter who is best known for his patriotic song, Aye Mere Watan Ke Logo, written as tribute to the soldiers who had died defending the country, during the Sino-Indian War.
His first recognition came for his patriotic lyrics for the film Bandhan (1940), though it was for writing a daringly patriotic song, “Door Haaton aye Duniya walon” (Move Away O Outsiders), in India’s first golden jubilee hit, Kismet (1943), that his status as a nationalistic writer got immortalized as, as soon after the film’s release, having provoked the ire of British government, he was forced to go underground to avoid arrest.
In a career span, of nearly five decades, Kavi Pradeep, wrote about 1,700 songs,[1] nationalistic poems including the lyrics for some 72 films, including hits like, “Chal Chal Re Naujawan”, film Bandhan (1940), “Aao Bachchon Tumhe Dikhayen” and “De Di Hame Azaadi Bina Khadag Bina Dhaal”, film Jagriti (1954), and “Yahaan vahaan jahaan tahaan mat poochho kahaan kahaan”, film Jai Santoshi Ma, (1975) for which he also did a playback version in the film. In 1958, HMV, released an album of 13 songs with his lyrics, soon he was made the Rashtrakavi, (Poet Laureate), and came to be known as, Kavi Pradeep.
In 1997, he was honoured by India’s highest award in Cinema, the Dada Saheb Phalke Award for Lifetime Achievement.

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

खुशी के साथ - वेलेंटाइन विरोधी

A bright future can give you many
dashing girls
but a dashing girls
cannot give you a bright future
happy anti-valentine day
proud to be a broken single

एक अच्छा भविष्य हमें....
ढेर सारी लडकिया दे सकता है

लेकिन एक लड़की
हमें अच्छा भविष्य नहीं दे सकती 

खुशी के साथ - वेलेंटाइन विरोधी 
हमें गर्व है की हम अकेले है ......

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

सोशल नैटवर्किंग ने हमारी लाइफ़ को किस तरह से बदल दिया है, इसकी एक बानगी देखिए :


मालकिन (नौकरानी से) : कांता बाई! तुम तीन दिन काम पर नही आई,क्या बात है?
नौकरानी : मेमसाब! मैने तो फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट कर दिया था कि तीन दिनो के लिए गाँव जा रही हूँ, साहब(आपके पति) का कमेंट भी आया था, “हैव ए सेफ ट्रिप, हनी! जल्दी लौटना, तुम्हारे बिना जी नही लगता”

भाषा एक संस्कार

एक पुरानी कथा है । एक राजा शिकार खेलने के लिए वन में गया । शेर का पीछा करते करते बहुत दूर निकल गया। सेनापति और सैनिक सब इधर उधर छूट गए। राजा रास्ता भटक गया। सैनिक और सेनापति भी राजा को खोजने लगे।सभी परेशान थे। एक अंधा भिखारी चौराहे पर बैठा था। कुछ सैनिक उसके पास पहुँचे। एक सैनिक बोला 'क्यों बे अंधे ! इधर से होकर राज गया है क्या?'
'नहीं भाई !' भिखारी बोला। सैनिक तेजी से आगे बढ गए।
कुछ समय बाद सेनापति भटकते हुआ उसी चौराहे पर पहुँचा।उसने अंधे भिखारी से पूछा 'क्यों भाई अंधे ! इधर से राज गए हैं क्या?'
'नहीं जी, इधर से होकर राजा नहीं गए हैं ।'
सेनापति राजा को ढूँढने के लिए दूसरी दिशा में बढ़ ग़या।

इसी बीच भटकते-भटकते राजा भी उसी चौराहे पर जा पहुँचा। उसने अंधे भिखारी से पूछा - 'क्यों भाई सूरदास जी ! इस चौराहे से होकर कोई गया है क्या?'
'हाँ महाराज ! इस रास्ते से होकर कुछ सैनिक और सेनापति गए हैं।'
राजा चौंका - 'आपने कैसे जाना कि मैं राजा हूँ और यहाँ से होकर जाने वाले सैनिक और सेनापति थे ?'
'महाराज ! जिन्होंने 'क्यों बे अंधे' कहा वे सैनिक हो सकते हैं। जिसने 'क्यों भाई अंधे' कहा वह सेनापति होगा। आपने 'क्यों भाई सूरदास जी !'कहा.आप राजा हो सकते हैं।आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और भाषा संस्कार से बनती है। जिसके जैसे संस्कार होंगे, वैसी ही उसकी भाषा होगी ।

जब कोई आदमी भाषा बोलता है तो साथ में उसके संस्कार भी बोलते हैं। यही कारण है कि भाषा शिक्षक का दायित्व बहुत गुरुतर और चुनौतीपूर्ण है। परम्परागत रूप में शिक्षक की भूमिका इन तीन कौशलों - बोलना, पढ़ना और लिखना तक सीमित कर दी गई है। केवल यांत्रिक कौशल किसी जीती जागती भाषा का उदाहरण नहीं हो सकते हैं। सोचना और महसूस करना दो ऐसे कारक हैं जिनसे भाषा सही आकार पाती है। इनके बिना भाषा गूँगी एवं बहरी है, इनके बिना भाषा संस्कार नहीं बन सकती, इनके बिना भाषा युगों-युगों का लम्बा सफर नहीं तय कर सकती; इनके बिना कोई भाषा किसी देश या समाज की धड़कन नहीं बन सकती। केवल सम्प्रेषण ही भाषा नहीं है। दर्द और मुस्कान के बिना कोई भाषा जीवन्त नहीं हो सकती। सोचना भी केवल सोचने तक सीमित नहीं । सोचने में कल्पना का रंग न हो तो क्या सोचना। कल्पना में भाव का रस न हो तो किसी भी भाषा का भाषा होना बेकार। भाव ,कल्पना और चिन्तन भाषा को उसकी आत्मा प्रदान करते हैं।

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भाषा-शिक्षक खुद ही पूरे समय बोलता रहे,यह शिक्षण की सबसे बडी क़मजोरी है। प्रायः यह देखने में आता है कि बहुत से बच्चों को वर्ष में एक बार भी भाषा की कक्षा में बोलने का अवसर नहीं मिल पाता है। बिना बोले भाषा का परिष्कार एवं संस्कार कैसे हो सकता है? बच्चों के आसपास का संसार बहुत बड़ा एवं व्यापक है। दिन भर बहुत कुछ बोलने वाले वाले बच्चों को कक्षा में मौन धारण करके बैठना पड़ता है। यह किसी यातना से कम नहीं। बच्चों के भी अपने कच्चे-पक्के विचार हैं । उन्हें अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। अभिव्यक्ति का यह अवसर ही भाषा को माँजता और सँवारता है। 'खामोश पढ़ाई जारी है' की स्थिति भाषा के लिए शुभ संकेत नहीं है। हमें इस प्रवृत्ति में बदलाव लाना पडेग़ा। दुनिया के अधिकतर झगड़े भाषा के गलत प्रयोग,गलत हाव-भाव के कारण पैदा होते हैं। बिगड़े सम्बन्ध भाषा के सही प्रयोग से सुलझ भी जाते हैं। बहुत से 90 प्रतिशत अंक पाने वाले बच्चे भी कमजोर अभिव्यक्ति के चलते अपनी बात सही ढंग से नहीं कह पाते। अतः आज के परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक है कि बच्चें को बोलने का भरपूर मौका दिया जाए ; तभी अभिव्यक्तिकौशल में निखार आएगा।
छोटी कक्षाओं से ही इस दिशा में बल दिया जाना चाहिए। संवाद, समूह-गान एकालाप, कविता पाठ, कहानी कथन, दिनचर्या-वर्णन के द्वारा बच्चों की झिझक दूर की जा सकती है।
पाठ्य-पुस्तकें केवल दिशा निर्देश के लिए होती हैं .उन्हें समग्र नही मान लेना चाहिए। अतिरिक्त अध्ययन के द्वारा भाषा की शक्ति बढाई जा सकती। बच्चों को निरन्तर नया पढ़ने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। यह तभी संभव है, जब शिक्षक भी निरन्तर नया पढ़ने की ललक लिए हुए हों।

भाषा के शुद्ध रूप का बच्चों को ज्ञान होना चाहिए। इसके लिए निरन्तर अभ्यास जरूरी है। अशुद्ध शब्दों का अभ्यास नहीं कराना चाहिए। कुछ शिक्षक अशुद्ध शब्दों को लिखवाकर फिर उनका शुद्ध रूप लिखवाकर अभ्यास कराते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है। बच्चों को दोनों प्रकार के शब्दों का बराबर अभ्यास हो जाएगा। वे सही और गलत दोनों का समान अभ्यास करने के कारण शुद्ध प्रयोग करने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। संशोधित किये गए सही शब्दों की सूची अलग से बनवानी चाहिए.इससे यह पता चल सकेगा कि कौन छात्र किन -किन शब्दों की वर्तनी गलत लिखता रहा है। निर्धारित अन्तराल के बाद वर्तनी की अशुद्धियों में क्या कमी आई है। श्रुतलेख के माध्यम से अशुद्धियों में आई कमी का आकलन किया जा सकता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि सभी कौशलों का निरन्तर अभ्यास भाषा को प्रभावशाली बनाने की भूमिका निभा सकता है।
o रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त....

उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप
                   उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप माना जाता है पर सच यही है कि जिनका आचरण भ्रष्ट है वही आजकल उत्कृष्ट स्थानों पर विराजमान हो गये है। उनसे समाज का भला हो सकने की आशा करना स्वयं को ही धोखा देना है।
           कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विद्वता के शिखर पर भी वही लोग विराजमान हो गये हैें जो इधर उधर के विचार पढ़कर अपनी जुबां से सभाओं में सुनाते हैं। कुछ तो विदेशी किताबों के अनुवाद कर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं जैसे कि उनका अनुवादक होना ही उनकी विद्वता का प्रमाण है। उनके चाटुकार वाह वाह करते हैं। परिणाम यह हुआ है कि अब लोग कहने लगे हैं कि शैक्षणिक, साहित्यक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अब नया चिंतन तो हो नहीं रहा उल्टे लोग अध्ययन और मनन की प्रक्रिया से ही परे हो रहे हैं। जैसे गुरु होंगे वैसे ही तो उनके शिष्य होंगे। शिक्षा देने वालों के पास अपना चिंतन नहीं है और जो उनकी संगत करते हैं उनको भी रटने की आदत हो जाती है। ज्ञान की बात सभी करते हैं पर व्यवहार में लाना तो विरलों के लिऐ ही संभव हो गया है।
            अब तो यह हालत हो गयी है की अनेक लोगों को मिलने वाले पुरस्कारों पर ही लोग हंसते हैं। जिनको समाज के लिये अमृतमय बताया जाता है उनके व्यवसाय ही विष बेचना है। सम्मानित होने से वह कोई अमृत सृजक नहीं बन जाते। इससे हमारे समाज की विश्व में स्थिति तो खराब होती है युवाओं में गलत संदेश जाता है। फिल्मों में ऐसे गीतों को नंबर बताकर उनको इनाम दिये जाते हैं जिनका घर में गाना ही अपराध जैसा लगता है। फिल्म और टीवी में माध्यम से समाज में विष अमृत कर बेचा जा रहा है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म दर्शन से ही यह आशा रह जाती है क्योंकि वह समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाये रहता है।

....मौके ही जिंदगी को बदल जाते हैं।

दर्द के पल गुजर गये,
गम के बादलों ने भी
बरसना छोड़ दिया
तब लबों पर हंसी आ ही गयी।
जिंदगी का फलसफा
जो समझे हम
इसलिये कभी बुरे हालातों पर रोये नहीं
जोर से हंसने के मौके भी नहीं गवांये
जब खुशी घर में आ ही गयी।
 

कभी करना पड़ता है
मौके का इंतजार
कभी जिंदगी में जीत के मौके
सामने भी आ ही जाते हैं,
काबिल इंसान खुद बने या किस्मत बनाये
मगर मौके ही जिंदगी को बदल जाते हैं।

चाणक्य नीति दर्शन-धीरज हो तो निर्धनता की परवाह नहीं होती

दरिद्रता श्रीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीतया विराजते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर मनुष्य में धीरज हो तो गरीबी की पीड़ा नहीं होती। घटिया वस्त्र धोया जाये तो वह भी पहनने योग्य हो जाता है। बुरा अन्न भी गरम होने पर स्वादिष्ट लगता है। शील स्वभाव हो तो कुरूप व्यक्ति भी सुंदर लगता है।
अधमा धनमिच्छन्ति मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अधम प्रकृत्ति का मनुष्य केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम प्रकृत्ति के धन के साथ मान की तथा उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस विश्व में धन की बहुत महिमा दिखती है पर उसकी भी एक सीमा है। जिन लोगों के अपने चरित्र और व्यवहार में कमी है और उनको इसका आभास स्वयं ही होता है वही धन के पीछे भागते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि वह स्वयं किसी के सहायक नहीं है इसलिये विपत्ति होने पर उनका भी कोई भी अन्य व्यक्ति धन के बिना सहायक नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर यकीन तो करते हैं पर फिर भी धन को शक्ति का एक बहुत बड़ा साधन मानते हैं। उत्तम और शक्तिशाली प्रकृत्ति के लोग जिन्हें अपने चरित्र और व्यवहार में विश्वास होता है वह कभी धन की परवाह नहीं करते।
धन होना न होना परिस्थितियों पर निर्भर होता है। यह लक्ष्मी तो चंचला है। जिनको तत्व ज्ञान है वह इसकी माया को जानते हैं। आज दूसरी जगह है तो कल हमारे पास भी आयेगी-यह सोचकर जो व्यक्ति धीरज धारण करते हैं उनके लिये धनाभाव कभी संकट का विषय नहीं रहता। जिस तरह पुराना और घटिया वस्त्र धोने के बाद भी स्वच्छ लगता है वैसे ही जिनका आचरण और व्यवहार शुद्ध है वह निर्धन होने पर भी सम्मान पाते हैं। पेट में भूख होने पर गरम खाना हमेशा ही स्वादिष्ट लगता है भले ही वह मनपसंद न हो। इसलिये मन और विचार की शीतलता होना आवश्यक है तभी समाज में सम्मान प्राप्त हो सकता है क्योंकि भले ही समाज अंधा होकर भौतिक उपलब्धियों की तरफ भाग रहा है पर अंततः उसे अपने लिये बुद्धिमानों, विद्वानों और चारित्रिक रूप से दृढ़ व्यक्तियों की सहायता आवश्यक लगती है। यह विचार करते हुए जो लोग धनाभाव होने के बावजूद अपने चरित्र, विचार और व्यवहार में कलुषिता नहीं आने देते वही उत्तम पुरुष हैं। ऐसे ही सज्जन पुरुष समाज में सभी लोगों द्वारा सम्मानित होते हैं।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

सम्राट विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब तक था. सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर(juliyas seejar) को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जेन की सड़कों पर घुमाया था.

शकों को भारत से खदेड़ने के बाद सम्राट विक्रमादित्य ने पुरे भारतवर्ष में ही नही , बल्कि लगभग पूरे विश्व को जीत कर हिंदू संस्कृति का प्रचार पूरे विश्व में किया। सम्राट के साम्राज्य में कभी सूर्य अस्त नही होता था। सम्राट विक्रमादित्य ने अरबों पर शासन किया था, इसका प्रमाण स्वं अरबी काव्य में है । "सैरुअल ओकुल" नमक एक अरबी काव्य , जिसके लेखक "जिरहम विन्तोई" नमक एक अरबी कवि है। उन्होंने लिखा है,-------
"वे अत्यन्त भाग्यशाली लोग है, जो सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में जन्मे। अपनी प्रजा के कल्याण में रत वह एक कर्ताव्यनिष्ट , दयालु, एवं सचरित्र राजा था।"
"किंतु उस समय खुदा को भूले हुए हम अरब इंद्रिय विषय -वासनाओं में डूबे हुए थे । हम लोगो में षड़यंत्र और अत्याचार प्रचलित था। हमारे देश को अज्ञान के अन्धकार ने ग्रसित कर रखा था। सारा देश ऐसे घोर अंधकार से आच्छादित था जैसा की अमावस्या की रात्रि को होता है। किंतु शिक्षा का वर्तमान उषाकाल एवं सुखद सूर्य प्रकाश उस सचरित्र सम्राट विक्रम की कृपालुता का परिणाम है। यद्यपि हम विदेशी ही थे,फ़िर भी वह हमारे प्रति उपेछा न बरत पाया। जिसने हमे अपनी द्रष्टि से ओझल नही किया"। "उसने अपना पवित्र धर्म हम लोगो में फैलाया। उसने अपने देश से विद्वान् लोग भेजे,जिनकी प्रतिभा सूर्य के प्रकाश के समान हमारे देश में चमकी । वे विद्वान और दूर द्रष्टा लोग ,जिनकी दयालुता व कृपा से हम एक बार फ़िर खुदा के अस्तित्व को अनुभव करने लगे। उसके पवित्र अस्तित्व से परिचित किए गए,और सत्य के मार्ग पर चलाए गए। उनका यहाँ पर्दापण महाराजा विक्रमादित्य के आदेश पर हुआ। "
इसी काव्य के कुछ अंश बिड़ला मन्दिर,दिल्ली की यज्ञशाला के स्तभों पर उत्कीर्ण है,-------------------१-हे भारत की पुन्य भूमि!तू धन्य है क्योंकि इश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। २-वाह्ह ईश्वर का ज्ञान जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है,यह भारतवर्ष में ऋषियो द्बारा चारों रूप में प्रकट हुआ। ३-और परमात्मा समस्त संसार को आज्ञा देता है की वेड जो मेरे गान है उनके अनुसार आचरण करो। वह ज्ञान के भण्डार 'साम' व 'यजुर 'है। ४ -और दो उनमे से 'ऋग् ' व 'अथर्व 'है । जो इनके प्रकाश में आ गया वह कभी अन्धकार को प्राप्त नही होता।
सम्राट विक्र्मदियता के काल में भारत विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, नस्छ्त्र आदि विद्याओं का विश्व गुरु था। महान गणितग्य व ज्योतिर्विद्ति वराह मिहिर ने सम्राट विक्रम के शासन काल में ही सारे विश्व में भारत की कीर्ति पताका फहराई थी।
एक मित्र की टिपण्णी के द्वारा पता चला है कि सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जेन की सड़कों पर घुमाया था.
टिपण्णी यह है कि ----------------------
कालिदास-ज्योतिर्विदाभरण-अध्याय२२-ग्रन्थाध्यायनिरूपणम्-
श्लोकैश्चतुर्दशशतै सजिनैर्मयैव ज्योतिर्विदाभरणकाव्यविधा नमेतत् ॥ᅠ२२.६ᅠ॥
विक्रमार्कवर्णनम्-वर्षे श्रुतिस्मृतिविचारविवेकरम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे।
मत्तोऽधुना कृतिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्कनृपराजवरे समासीत् ॥ᅠ२२.७ᅠ॥
नृपसभायां पण्डितवर्गा-शङ्कु सुवाग्वररुचिर्मणिरङ्गुदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरो घटखर्पराख्य।
अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमो ॥ᅠ२२.८ᅠ॥
सत्यो वराहमिहिर श्रुतसेननामा श्रीबादरायणमणित्थकुमारसिंहा।
श्रविक्रमार्कंनृपसंसदि सन्ति चैते श्रीकालतन्त्रकवयस्त्वपरे मदाद्या ॥ᅠ२२.९ᅠ॥
नवरत्नानि-धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंहशङ्कुर्वेतालभट्टघटखर्परकालिदासा।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥ᅠ२२.१०ᅠ॥
यो रुक्मदेशाधिपतिं शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे।
आनीय सम्भ्राम्य मुमोच यत्त्वहो स विक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥ २२.१७ ॥
तस्मिन् सदाविक्रममेदिनीशे विराजमाने समवन्तिकायाम्।
सर्वप्रजामङ्गलसौख्यसम्पद् बभूव सर्वत्र च वेदकर्म ॥ २२.१८ ॥
शङ्क्वादिपण्डितवराः कवयस्त्वनेके ज्योतिर्विदः सभमवंश्च वराहपूर्वाः।
श्रीविक्रमार्कनृपसंसदि मान्यबुद्घिस्तत्राप्यहं नृपसखा किल कालिदासः ॥ २२.१९ ॥
काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततो ननु कियच्छ्रुतिकर्मवादः।
ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो हि ततो बभूव ॥ २२.२० ॥
वर्षैः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणै(३०६८)र्याते कलौ सम्मिते, मासे माधवसंज्ञिके च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः।
नानाकालविधानशास्त्रगदितज्ञानं विलोक्यादरा-दूर्जे ग्रन्थसमाप्तिरत्र विहिता ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥ २२.२१ ॥
ज्योतिर्विदाभरण की रचना ३०६८ कलि वर्ष (विक्रम संवत् २४) या ईसा पूर्व ३३ में हुयी। विक्रम सम्वत् के प्रभाव से उसके १० पूर्ण वर्ष के पौष मास से जुलिअस सीजर द्वारा कैलेण्डर आरम्भ हुआ, यद्यपि उसे ७ दिन पूर्व आरम्भ करने का आदेश था। विक्रमादित्य ने रोम के इस शककर्त्ता को बन्दी बनाकर उज्जैन में भी घुमाया था (७८ इसा पूर्व में) तथा बाद में छोड़ दिया।। इसे रोमन लेखकों ने बहुत घुमा फिराकर जलदस्युओं द्वारा अपहरण बताया है तथा उसमें भी सीजर का गौरव दिखाया है कि वह अपना अपहरण मूल्य बढ़ाना चाहता था। इसी प्रकार सिकन्दर की पोरस (पुरु वंशी राजा) द्वारा पराजय को भी ग्रीक लेखकों ने उसकी जीत बताकर उसे क्षमादान के रूप में दिखाया है।
http://en.wikipedia.org/wiki/Julius_Caesar
Gaius Julius Caesar (13 July 100 BC – 15 March 44 BC) --- In 78 BC, --- On the way across the Aegean Sea, Caesar was kidnapped by pirates and held prisoner. He maintained an attitude of superiority throughout his captivity. When the pirates thought to demand a ransom of twenty talents of silver, he insisted they ask for fifty. After the ransom was paid, Caesar raised a fleet, pursued and captured the pirates, and imprisoned them. He had them crucified on his own authority.
Quoted from History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November 1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice day. But people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some people considered that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning on a traditional lunar landmark.”
ज्योतिर्विदाभरण की कहानी ठीक होने के कई अन्य प्रमाण हैं-सिकन्दर के बाद सेल्युकस्, एण्टिओकस् आदि ने मध्य एसिआ में अपना प्रभाव बढ़ाने की बहुत कोशिश की, पर सीजर के बन्दी होने के बाद रोमन लोग भारत ही नहीं, इरान, इराक तथा अरब देशों का भी नाम लेने का साहस नहीं किये। केवल सीरिया तथा मिस्र का ही उल्लेख कर संतुष्ट हो गये। यहां तक कि सीरिया से पूर्व के किसी राजा के नाम का उल्लेख भी नहीं है। बाइबिल में लिखा है कि उनके जन्म के समय मगध के २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। सीजर के राज्य में भी विक्रमादित्य के ज्योतिषियों की बात प्रामाणिक मानी गयी।

नवीन त्यागी-- प्रदेश महासचिव ,हिन्दू महासभा ,उत्तर प्रदेश, सदस्य--केन्द्रीय उच्चाधिकार समिति ,हिन्दू महासभा

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

जीवन दर्शनशास्त्र की पाठशाला नहीं है

तुम्हारी समस्याओं को हल करने का अर्थ है--तुम्हें एक उत्तर देना जो तुम्हें बौद्धिक स्तर पर संतुष्ट करता हो; और तुम्हारी समस्याओं को समाप्त करने के लिए--तुम्हें एक विधि देना जो तुम्हें स्वयं अवगत करा दे कि समस्या जैसा कुछ है ही नहीं: समस्याएं हमारी स्वयं की कृतियां हैं और उसके लिए किसी उत्तर की आवश्यकता नहीं है।
प्रबुद्ध चेतना के पास कोई उत्तर नहीं है। इसका सौंदर्य यही है कि इसके पास कोई प्रश्न नहीं है। इसके सभी प्रश्न समाप्त हो चुके हैं, तिरोहित हो चुके हैं। लोग दूसरी तरह से सोचते हैं: वे सोचते हैं कि प्रबुद्ध व्यक्ति के पास हर बात का उत्तर होना चाहिए। और वास्तविकता यह है कि उसके पास कोई भी उत्तर नहीं है। उसके पास कोई प्रश्न ही नहीं है। बिना प्रश्नों के उसके पास कोई उत्तर कैसे हो?
एक महान कवयित्री, गरट्रूड स्टीन, अपने मित्रों से घिरी हुई मर रही थी कि अचानक उसने अपनी आंखें खोलीं और कहा, "क्या है उत्तर?'
किसी ने कहा, "लेकिन हमें प्रश्न ही पता नहीं है, तो हम उत्तर कैसे जान सकते हैं? आखिरी बार उसने अपनी आंखें खोलीं और कहा, "ठीक है, तो प्रश्न क्या है?' और वह मर गई। एक अनोखा आखिरी वक्तव्य।
कवियों,चित्रकारों,नर्तकों और गायकों के अंतिम वचन हासिल कर पाना अति सौंदर्यपूर्ण होता है। उन वचनों में कुछ अत्यंत सार्थक समाहित होता है।
पहले उसने पूछा, "क्या है उत्तर?'...जैसे कि विभिन्न मनुष्यों के लिए प्रश्न भिन्न नहीं हो सकते। प्रश्न वही होने चाहिए; इसे कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। और वह जल्दी में थी, इसलिए उचित रास्ते से जाने के बजाय--प्रश्न पूछना और फिर उसके उत्तर सुनना--उसने इतना ही पूछा, "क्या है उत्तर?'
लेकिन लोग नहीं समझते कि हर व्यक्ति उसी स्थिति में है: वही प्रश्न सभी का प्रश्न है। इसलिए कोई मूर्ख व्यक्ति पूछ सकता है कि, "लेकिन यदि हम प्रश्न ही नहीं जानते तो हम उत्तर कैसे दे सकते हैं?'
यह तर्कपूर्ण लगता है, लेकिन ऐसा है नहीं, यह मात्र मूर्खतापूर्ण है--और वह भी एक मरते हुए व्यक्ति से...लेकिन उस वेचारी महिला ने एक बार फिर अपनी आंखें खोलीं। उसने कहा, "ठीक है, क्या है प्रश्न?' और फिर वहां सन्नाटा हो गया।
कोई "प्रश्न' नहीं जानता, कोई "उत्तर' नहीं जानता। वास्तव में न तो कोई प्रश्न है, और न हीं कोई उत्तर है; विचारों में जीना, भ्रांतियों में जीने का का एक ढंग है। तब लाखों प्रश्न हैं और लाखों उत्तर, और प्रत्येक प्रश्न फिर और सैकड़ों प्रश्न ले आता है, और इसका कोई अंत नहीं है। लेकिन जीने का एक दूसरा ढंग भी है: होशपूर्वक जीना-- और तब न उत्तर है, न प्रश्न है। जब गरट्रूड स्टीन मर रही थी, यदि मैं वहां मौजूद होता, मैं उससे कहता, "यह क्षण प्रश्न और उत्तर के लिए परेशान होने का नहीं है। याद रखो, न कोई प्रश्न है और न कोई उत्तर: अस्तित्व प्रश्न और उत्तर के विषय में पूर्णतया मौन है। यह कोई दर्शन-शास्त्र की कक्षा नहीं है। बिना किसी प्रश्न के, और बिना किसी उत्तर के मृत्यु में उतर जाओ; बस चुपचाप, होशपूर्वक, शांतिपूर्वक मृत्यु मे उतर जाओ।'

(सौजन्‍य से : ओशो न्‍यूज लेटर)








सोमवार, 9 जनवरी 2012

जो खेत, हल चलने से दुखी हो

जो पत्थर,
छेनी और हथोडी की मार से रोने लगे
वो कभी मूर्ति का रूप नहीं ले सकता

जो खेत,
हल चलने से दुखी हो
वो कभी अनाज पैदा नहीं कर सकता

बिलकुल वैसे ही
माता पिता और शिक्षक की डाट- मार को
न समझने वाला कभी सफल नहीं हो सकता....

सच्ची माँ वाही है जो
अपने बेटे के एबो में हुनर देखती है
















सच्चा पिता वाही है जो
गलतिय करने के पहले सचेत करता है

सच्चा शिक्षक वाही है जो
भविष्य के सफल मार्ग निर्माण करता है
--------- अनूप पालीवाल 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

शुभ रात्रि .......

वो मेरे ख्वाबो में सो रहे है ....
कंही उनकी नींद न टूट जाये
इस लिए हम भी सो रहे है .....
शुभ रात्रि .......